साईं बाबा ही नहीं, स्वामीनारायण उर्फ़ घनश्याम पांडे भी “भगवान” नहीं थे!

इस वक़्त देश को वह फ़र्ज़ी भगवान नहीं चाहिए, जिसके नाम पर तमाम तरह के धत्कर्म, मनी मेकिंग और लैंड ग्रैविंग के खेल चल रहे हों, बल्कि वह नायक चाहिए, जो लोगों को गरीबी, मुफलिसी, अशिक्षा, बेरोज़गारी और अंधविश्वास से मुक्ति दिलाए, उसे सही रास्ते पर ले जाए, उसकी ऊर्जा को देश के विकास के लिए केंद्रित करे।

साईं बाबा भगवान नहीं थे- यह तो तय है और इसीलिए शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की कई “दलीलों” से सहमत नहीं होते हुए भी “तथ्य” के आधार पर मैंने उनका समर्थन किया था। एक और तथाकथित “भगवान” हैं- स्वामीनारायण संप्रदाय के घनश्याम पांडे उर्फ नीलकंठवर्णी उर्फ सहजानंद स्वामी (2 अप्रैल 1781 – 1 जून 1830), जिनके अनुयायी उन्हें “भगवान स्वामीनारायण” मानते हुए उनकी पूजा करते हैं। अक्षरधाम मंदिर के नाम से गुजरात और दिल्ली में उनके बड़े मंदिर हैं।

दिल्ली का अक्षरधाम मंदिर मैंने भी देखा है। यमुना के तट पर बने इस मंदिर का परिसर सौ एकड़ में फैला है और यह दुनिया का सबसे बड़ा मंदिर परिसर है। गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने भी इसे दुनिया के सबसे बड़े मंदिर परिसर के तौर पर मान्यता दी है। इस मंदिर के गर्भगृह में स्वामीनारायण जी की विशाल प्रतिमा स्थापित है, जबकि हिन्दू धर्म के दूसरे तमाम स्थापित देवी-देवताओं (जिनका शास्त्रो में वर्णन है) की छोटी-छोटी प्रतिमाएं इस तरह स्थापित हैं, जैसे वे सभी उनके मातहत कर्मचारी हों।

घनश्याम पांडे जी ने बड़े अच्छे काम किए होंगे और उम्दा संत रहे होंगे, इस बात से मुझे इनकार नहीं है और उनके लिए मान-सम्मान में भी कोई कमी नहीं है, लेकिन आर्य समाज के संस्थापक और महान समाज-सुधारक महर्षि दयानंद सरस्वती ने भी उन्हें “भगवान” मानने से इनकार किया था। क्या विडंबना है कि जिन लोगों ने देश और समाज के लिए ज़्यादा बड़े काम किये, उन्होंने कभी अपने को “भगवान” साबित करने की कोशिश नहीं की। तुलसी, सूर, कबीर और रविदास से लेकर ख़ुद दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, राजा राममोहन राय और महात्मा गांधी तक इसके ज्वलंत प्रमाण हैं।

समझ नहीं आता कि पिछले 100-200 साल में वो कौन-सा “वायरस” चला, जिसकी वजह से बड़ी संख्या में संतों-आचार्यों-गुरुओं-बाबाओं के सिर पर “भगवान” बनने का “भूत” सवार हो गया?

“भगवान” कहलाये वे, जिन्होंने वस्तुतः देश और समाज का उद्धार कम किया और अंधविश्वास ज़्यादा फैलाया, मठों का विस्तार ज़्यादा किया, धन-सम्पत्ति ज़्यादा इकट्ठी की, तिकड़मियों, लैंड ग्रैवरों और ब्लैक मनी मेकरों के प्रति अधिक कृपालु रहे। मुझे यह भी समझ नहीं आता कि पिछले 100-200 साल में वो कौन-सा “वायरस” चला, जिसकी वजह से बड़ी संख्या में संतों-आचार्यों-गुरुओं-बाबाओं के सिर पर “भगवान” बनने का “भूत” सवार हो गया? फ़र्ज़ी भगवानों की फ़सल यूं लहलहाती देखकर भी क्या महज आस्था और लोगों की भावनाओं के नाम पर हम ख़ामोश रह जाएं?

मेरा स्पष्ट मानना है कि इस वक़्त देश को वह फ़र्ज़ी भगवान नहीं चाहिए, जिसके नाम पर तमाम तरह के धत्कर्म, मनी मेकिंग और लैंड ग्रैविंग के खेल चल रहे हों, बल्कि वह नायक चाहिए, जो लोगों को गरीबी, मुफलिसी, अशिक्षा, बेरोज़गारी और अंधविश्वास से मुक्ति दिलाए, उसे सही रास्ते पर ले जाए, उसकी ऊर्जा को देश के विकास के लिए केंद्रित करे। सॉरी, मैं धर्म का ज्ञाता नहीं हूं… इसके बावजूद आज दोबारा मैंने कुछ कटु वचन कहे हैं। आशा करता हूं कि मित्र लोग बुरा मानने की बजाय मेरी बातों को सही संदर्भ में समझने की कोशिश करेंगे। शुक्रिया।

अभिरंजन कुमार भारत के वरिष्ठ हिन्दी कवि और पत्रकार हैं।
अभिरंजन कुमार भारत के चर्चित हिन्दी कवि और पत्रकार हैं।

वरिष्ठ कवि और पत्रकार अभिरंजन कुमार के फेसबुक वॉल से।

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